ABHINAYA (अभिनय)

अभिनय

मानव का प्रकृति  से अटूट सम्बन्ध है । आदी काल से मानव पर उसके सामाजिक गतिविधियों  का और प्राकृतिक गतिविधियों का प्रभाव रहा है । इन प्रभावों ने ही मानव संस्कृति और सभ्यता को दिशा दी है । मानव मन में उत्पन्न होने वाले भाव सभी इन प्राकृतिक एवं सामाजिक गतिविधियों के कारन है । मन के यही भाव धीरे धीरे अभिनय कला  में विक्सित हुई और बाद में इनसे कई ललित कलाओं का भी जनम हुआ । 

अभिनय शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की 'नी ' धातु से हुआ है । उपसर्ग 'अभि'  का अर्थ है ' की ओर  ', और  ' नी ' ( 'ले जाना ' ) के साथ जुड़ कर , यह शब्द यह समझाता है की इसके द्वारा भावों को दूसरों तक पहुँचाया जा सकता है । यथार्थ कवि या रचनाकार के  रचनाओं के अर्थ को कलाकार भाव प्रदर्शन से व्यक्त  करता है ताकि दर्शक  संपूर्ण रचना का आनंद उठा सके  ।
जो कलाकार जितनी स्वाभाविकता के साथ रचना के पात्रों के मन के भाव को अभिव्यक्त करता है , वह उतना ही बेहतरीन कलाकार माना जाता है ।ऐसे कलाकारों के प्रदर्शन के उपरांत दर्शक आनंद और रास से अभिभूत हो जाते हैं ।

मनुष्य के सोचने , बोलने और करने से तीन तरह के अभिनय का उत्पत्ति होता है । उद्धाहरण स्वरुप सोचने की प्रतिक्रिया से सात्त्विक अभिनय को उत्पन्न करता है । बोलने की प्रतिक्रिया से उत्पन्न होने वाली अभिनय वाचिक अभिनय कहलाती है और अंगों के क्रिया से उत्पन्न होने वाली अभिनय वाचिक अभिनय कहलाता है । इन तीनों के अलावा एक और प्रकार का अभिनय है जो की पात्रों के वेश भूषा एवं साज सज्जा से सम्बन्ध रखता है । नंदिकेश्वर ने अभिनय दर्पण में अभिनय प्रस्तुत करने की इन विधियोँ के बारे में उल्लेख किया है , उनके अनुसार अभिनय कला के मूल स्रोत प्रकृति और शिव से जुड़ा हुआ है। उन्होंने विस्तार से कहा है की  वाणी से गायन प्रस्तुत करना चाहिए और गायन का अर्थ मुद्राओं और विभिन्न अंग संचालन द्वारा प्रस्तुत करना चाहिए । अभिनय के इन चार प्रकाररों को
 अब हम विस्तार से समझते हैं ।

1. आंंगिक अभिनय : अंगों द्वारा व्यतीत किया गया अभिनय आंगिक अभिनय कहा जाता है  भारत मुनि ने सर्वप्रथम इसका जिक्र अपने नाट्यशास्त्र में किया था । उनके बाद नंदिकेश्वर ने इसका विस्तृत वर्णन अभिनय दर्पण में किया । उनके अनुसार आंगिक अभिनय का प्रदर्शन  शरीर के अंग , प्रत्यंग और उपांगों द्वारा किया जाता है । 
नाट्यशास्त्र के अनुसार आंगिक अभिनय के तीन भेद है : 
शरीरज - शरीर के मुख्य अंगों जैसे सिर , हाथ , पैर  आदि के   सहायता से प्रस्तुत किया गया अभिनय शरीरज कहलाता है  । 
मुखज - मुख के उपांगों के मदद से प्रस्तुत किया गया अभिनय जैसे आँख , कपोल , भौंह के सञ्चालन से , मुखज कहलाता है । 
चेष्टाकृत - पूरे शरीर के अंगों के प्रयोग से जब भावों को दर्शाया जाये ,जैसे किसी बूढ़े व्यक्ति  की चल का अनुकरण करना चेष्टाकृत आंगिक अभिनय कहलाता है । 

2. वाचिक अभिनय - भाषा या बोली के अंतर्गत वाणी द्वारा भावों की अभिव्यक्ति करने को वाचिक अभिनय कहा जाता है । अपने पात्रों के अनुसार वाणी के लय  , उतार चढ़ाव से अभिनय प्रस्तुत करना वाचिक अभिनय कहा जाता है । इसका प्रयोग नाट्य में ज्यादा होता है , पर नृत्य में वंदना से ले कर विभिन्न बोलों की पढंत से ले कर ठुमरी आदि में वाचिक अभिनय का महत्त्वपूर्ण योगदान रहता है । 

3. आहार्य अभिनय - भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में आहार्य अभिनय का विस्तार से वर्णन किया है । 'नेपथ्य विधि ' का नाम ही आहार्य अभिनय है । रंगमंच के पीछे जहां कलाकारों को सजाया जाता है , नेपथ्य कहलाता है । पात्रों की भिन्न भिन्न प्रकृतियाँ एवं अवस्थाएं होती है । रंगमंच पर किसी भी पात्र की सर्वप्रथम पहचान उसके रूप सज्जा से  होता है , दर्शकों को पात्रों के बारे में सर्वप्रथम ज्ञांत (उनके देश , काल , अवस्था आदि )उनके उचित आहार्य द्वारा ही होता है  । उसके बाद कलाकार आंगिक , वाचिक अवं सात्त्विक अभिनय की सहायता से अपना अभिनय प्रस्तुत करता है । इसी कारणवश नाट्य कला में और नृत्य में आहार्य अभिनय को आसाधारण महत्व दी गयी है 
आहार्य अभिनय चार प्रकार में संपन्न होता है -
पुस्त- पुस्त का अर्थ मंच सज्जा और मंच पर  बनायीं जाने वाली आकृतियों से है । 
अलंकार - वस्त्र एवं आभूषण का धारण करना ।
अंगरचना - किसी पात्र का रूप सज्जा अंगरचना कहलाता है ।
संजीव - जब मुखौटे लगाकर अन्य जीव जंतु का अभिनय संपन्न किया जाता है तो वह संजीव के अंतर्गत संपन्न होता है ।

4. सात्त्विक अभिनय - दूसरों के भावों में अभिभूत हो जाने को  सत्त्व कहते हैं । चारों प्रकार के अभिनय में से यह सब से कठिन माना  गया है । जब कलाकार , पात्र के भावावस्था में पूरी तरह से डूब जाये तो सात्त्विक भाव अपने आप प्रकट होने लगते हैं । मन में आठ प्रकार के सात्त्विक भाव उत्पन्न हो सकते हैं : 
स्तम्भ (स्तंभित या अचंभित होना),
 स्वेदाम्बु(पसीना पसीना होना), 
रोमांच (रोमांचित होना),
 स्वर भंग( वाणी का लड़खड़ाना ),
 वेपथु ( कंप कंपी होना),
 वैवरना( चेहरे  की आकृति बदल जाना ), 
अश्रु ( आंसू आना ) ,
 और प्रलय ( मूर्छित हो जाना )  । इन्ही भावों का प्रदर्शन सात्त्विक अभिनय कहलाता है 


उपर्युक्त चारों प्रकार के अभिनय का भली भांति अभ्यास से ही कला में शुद्धता , कलात्मकता , एवं  गहराई आ सकती है । हम देखते हैं  नृत्य के तीनों भेदों में से , नृत्त में आंगिक अभिनय का , नाट्य में वाचिक अभिनय का और नृत्य में सात्त्विक अभिनय का प्रधान महत्त्व है । आहार्य अभिनय तीनों में समान रूप से महत्व रखता है ।

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