Kathak mein ankhon ka mahatva

Importance of eyes in kathak

कत्थक में आँखों का महत्व :

भाव प्रदर्शन कत्थक नृत्य का एक अभिन्न अंग है । कत्थक शब्द की उत्पत्ति कथा से है और कत्थक नृत्य का नृत्यकार एक प्रकार से कथाकार ही है । अतएव अपनी कथा को दर्शाने के लिए नर्तक भाव का भरपूर प्रयोग करता है । नृत्य को भाव प्रदर्शन से और सजीव बनाने के लिए हम अपने शरीर के अंग प्रत्यंग एवं उपांगों का प्रयोग करते हैं । हमारे नेत्र सबसे छोटे उपांग होते हुए भी बहुत महत्त्वपूर्ण है । कई तरह के भावों की व्याख्या हम अपने आँखों से करते हैं ।

नाट्यशास्त्र और अभिनय दर्पण जैसे ग्रंथो में नेत्राभिनय के महत्व् को देखते हुए आठ प्रकार के दृष्टि भेदों का वर्णन किया गया है । जब हम आँखों को संचालित करते हैं तो इसी सन्दर्भ में आँखों के पुतलियां , पलकें एवं भौवें भी आती है । इसलिए भारत मुनि ने भ्रू सञ्चालन के सात प्रकार बतलायी है ।

दृष्टि भेद -(Drishti bhed)

यह आठ प्रकार की बताई गयी हैं –

1. सम दृष्टि – अपलक सीधे सामने देखने को सम दृष्टि कहते है । देव प्रतिमा दिखाने के लिए , नृत्य के आरम्भ में ,सोच विचार या स्मरण करने की क्रिया को दिखने के लिए या बाण से निशाना लगाने को दर्शाने के लिए किया जाता है ।

२ .साची दृष्टि – जब नृत्य में हम कनखियों से (या आँखों के कोनों से ) देखने की कोशिश करते हैं तो उसे साची दृष्टि कहते हैं । इस दृष्टि का प्रयोग इशारे से कुछ बताने के लिए या संकेत करने में होता है।

३ .प्रलोकित दृष्टि – इस दृष्टि में आँखों की पुतलियों को हम एक और से दूसरी और चलाते हुए देखने की कोशिश करते हैं । किसी भी चलती हुए वस्तु को देखने के लिए , दोनों तरफ की चीज़ों को देखने के लिए प्रयोग में लाया जाता है ।

४ . आलोकित दृष्टि – आँखों को पूर्ण तरह से खोल कर ,पुतलियों को घूमते हुए देखने को आलोकित दृष्टि कहते है । इस दृष्टि में हमारी पुतलियां गोल आकार में घूमतीं है और इसका प्रयोग कुम्हार के चाक को बताने के लिए ,या आस पास की सभी वस्तुओं को देखने के लिए की जाती है ।

५ . निमीलित दृष्टि – आधे खुले हुए नयनों से देखने को निमीलित दृष्टि कहते है । इस दृष्टि का प्रयोग जप , ध्यान ,सर्प या सूक्षम दृष्टि बताने के लिए किया जाता है ।

६ . उल्लोकित दृष्टि – ऊपर की तरफ देखने को उल्लोकित दृष्टि कहा जाता है । इसका प्रयोग मंदिर की चोटी , ध्वजा ,ऊंचाई ,चाँद इत्यादि बताने में होता है ।

७ .अवलोकित दृष्टि – इस दृष्टि में हम नीचे की ओर देखते हैं । इससे हम छाया , शैय्या , श्रम आदि बताते हैं ।

८ . अनुवृत्त दृष्टि – वेग से ऊपर नीचे देखने को अनुवृत्त दृष्टि कहते हैं । जब हमें क्रोध से देखना हो तो हम इस दृष्टि का प्रयोग करते हैं ।

भ्रू सञ्चालन – (bhru sanchalan/brow movement)

१ . सहज – यह है भृकुटियों की स्वाभाविक स्तिथि ।

२ . उत्क्षेप – ज़रुरत के अनुसार भृकुटियों को ऊपर चढ़ाना ।

३ . पातन – भृकुटियों को झुका देना ।

४. भृकुटि – भौहों को इधर उधर घुमाना या चढ़ाना ।

५. चतुर – इसमें भौहों को फैलाया जाता है ।

६ . कुंचित – भौहों को नीचे की तरफ मोड़ना ।

७ . रेचित – इसमें एक भृकुटि को उठाया जाता है ।

कत्थक में उपरिलिखित नेत्र एवं भ्रू सञ्चालन को सहजता से करने के लिए इनका नियमित अभ्यास होना आव्यशक है । नृत्य के चाल के साथ साथ हमें इनका अभ्यास करना चाहिए । दाएं ,बाएं ,ऊपर नीचे देखना ,पुतलियों को घुमाने की क्रिया ,भौहों को बारी बारी से चलना , इन सबका अभ्यास अपने शक्ति अनुसार करना चाहिए । आखें थक जाने से यह अभ्यास रोक देना चाहिए ।

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