DHWANI AND NAAD

ध्वनि(DHWANI)

जो कुछ भी हम सुन सकते हैं उसे ध्वनि कहते हैं । हमारे चारों तरफ के आवाज़ ध्वनि है। कुछ ध्वनि सुनने में मधुर है और कुछ कर्कश । इन्ही मधुर ध्वनि के समूह से संगीत बनता है । ध्वनि की उत्पत्ति कम्पन्न से होती है । संगीत की भाषा में कम्पन्न को आंदोलन(AANDOLAN) कहते है । जब हम सितार के तारों को छेड़ते है तो वह कुछ समय तक ऊपर नीचे जाता है ।इसी ऊपर नीचे जाने को कम्पन्न कहते है । सितार ,तानपुरा आदि वाद्य यन्त्र में तारों में कम्पन्न होता है,बांसुरी हवा में कम्पन्न पैदा करता है, तबला एवं पखावज अपने चमड़े के पूड़ी में कम्पन्न लाते है । अतएव किसी भी तरह के ध्वनि को उत्पन्न करने के लिए कम्पन्न ज़रूरी है । जब सितार के तार अपने जगह से ऊपर जाकर ,फिर नीचे जाकर अपनी जगह में वापस आता है उसे एक कम्पन्न कहते है ।

नाद (NAAD)

‘न नादेन बिना गीतं न नादेन बिना स्वरः।
न नादेन बिना नृत्त तसमानंदात्मक जगत॥’

अथार्थ नाद के बिना न गीत की उत्पत्ति हो सकती है और न स्वर की ।नृत्य भी नाद बिना संभव नहीं है । नाद इस पूरे विश्व में समाया हुआ है ।
नाद का संधि विच्छेद करो तो ना+द बनता है । ना का अर्थ नकार यानी ‘प्राण ‘ है । ‘द’ अथार्थ अग्नि । हमारे प्राण ऊर्जा रुपी अग्नि से हमारे शरीर से ध्वनि या नाद उत्पन्न करती है ।नियमित एवं स्थिर आंदोलन संख्या वाली मधुर ध्वनि को नाद कहते है ।जो ध्वनि मधुर नहीं होती वो ना तो नाद कहलाती है और ना तो संगीत में प्रयोग होती है ।

नाद दो प्रकार के होते है :-
अनाहत नाद -यह प्रकृति में विद्यमान होती है ,किसी जीव या वस्तु द्वारा प्रत्यक्ष आघात से पैदा नहीं होती ।
आहत नाद – जो ध्वनि टकराने से या घर्षण से उत्पन्न होती है उसे आहत नाद कहते है

नाद के तीन विशेषताएं माने जाते है ।
.नाद का बड़ा या छोटा होना -एक ही ध्वनि को धीरे से या जोर से उत्पन्न कर सकते है । जब ध्वनि धीरे है तो उसे छोटा नाद और जब ध्वनि जोर से है तो उसे बड़ा नाद कहते है । नाद का बड़ा या छोटा होना इस बात पर निर्भर है की उसे उत्पन्न करने के लिए कितने ऊर्जा का इस्तेमाल हुआ है ।
२.नाद की जाति – हर एक वस्तु,मनुष्य या वाद्य से निकला हुआ स्वर अलग होता है । यही कारण है की हम बिना देखे भी यह पता चला लेते है की यह ध्वनि किस वाद्य यन्त्र की है । नाद का यह गुण , नाद की जाति है ।
३. नाद का ऊँचा या नीचे होना – संगीत में जब हम स्वरों को सुनते है तो हम देखते है कि ‘सा’ से ऊँचा ‘रे ‘ ,से ऊंच ‘ग’ आदि है । नाद के इसी विशेषता को नाद का ऊँचा या नीचे होना बताया जाता है ।

श्रुति(SHRUTI)

‘नित्यं गीतोउपयोगित्वमभिज्ञेयत्वमप्युत।
लक्ष्ये प्रोक्तं सुपर्याप्तब संगीत श्रुति लक्षणम ॥’

अतार्थ वह ध्वनि जो गीत में प्रयोग की जा सके ,जो एक दुसरे से अलग तथा स्पष्ट पहचानी जा सके ,उसे श्रुति कहते है । संगीतज्ञ कहते है की एक सप्तक में असंख्य नाद हो सकते है पर इनमे से २२ ही संगीत में प्रयोग किया जा सकता है । इन्ही २२ नादों को श्रुति कहते है । इन श्रुतियों के नाम है- तीव्रा, कंदवति, मंदा,चंदोवाती,दयावती ,रंजनी रक्तिका ,रौद्री क्रोधी वज्रिका ,प्रसारिणी ,प्रीति,मार्जनी ,क्षिति ,रक्ता, सांदीपनि ,आलपिनी, मंदती, रोहिणी ,रम्या,उग्रा, क्षोभिणी
इन श्रीतियों से स्वरों का निर्माण होता है

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