Nav ras in kathak

नव रस(Nav ras)


भारत मुनि के अनुसार नृत्य में ८ रस मणि गई है । यह हैं -वीर ,श्रृंगार, करुण,हास्य,भयानक,रौद्र,वीभत्स और अद्भुत । इनमे जब शांत रस मिल जाता है तो इनकी संख्या ९ हो जाती है ।विद्वानों ने वात्सल्य और भक्ति रस को भी परिभाषित किया है पर इनका रसों में गिनती करना आज भी विवादित है ।नव रसों का संक्षिप्त परिचय नीचे दिए गए हैं ।


श्रृंगार रस(shringaar ras) – इस रस को दर्शाने के लिए चेहरे पर सौंदर्य का भाव,मुख पर ख़ुशी, आँखों में मस्ती की झलक इत्यादि । भारत मुनि के अनुसार जो कुछ भी शुद्ध ,पवित्र ,उत्तम और दर्शनीय है वही श्रृंगार रस है ।इस रस का स्थायी भाव रति है। इसके दो भेद माने जाते हैं -संयोग श्रृंगार एवं वियोग श्रृंगार ।
वीर रस(veer ras) -वीर रस के चार भेद माने जाते है- धर्मवीर,दानवीर,युद्ध वीर और दयावीर ।इसका स्थायी भाव उत्साह है और फड़कते हुए हाथ ,आँखों में तेज और गर्व आदि भंगिमाओं से दर्शाया जाता है ।
हास्य रस (haasya ras)-हास्य रस ६ प्रकार का होता है ।मुख्यतः -स्मित,हसित विहसित ,अवहसित ,अपहसित ,और अतिहसित ।जब हास्य अआंखों के थोड़े से विकार से दर्शाते है तो उसे हम स्मित कहते हैं,अगर थोड़े से दांत दिखाई दे तो वह हसित कहलाता है ,अगर थोड़े मधुर शब्द भी निकले तो विहसित,हँसते समय अगर कंधे और सर भी कांपने लगे तो अवहसित,इसके साथ यदि आंसू भी आ जाए तो अपहसित और हाथ पेअर पटक कर,पेट दबा कर हंसने को अतिहसित कहा जाता है ।
करुण रस(karun ras) -इस रस का स्थायी भाव शोक है ।इसको दर्शाते हुए चेहरे पर शोक की झलक होती है और आँखों की दृष्टि नीचे गिरी हुई होती है ।करुण रस मानव ह्रदय पर सीधा प्रभाव करता है ।
अद्भुत रस(adbhut ras) -इस रस का स्थायी भाव विस्मय है ।इसे दर्शाने के लिए नर्तक अपने चेहरे पर आश्चर्य की भाव और आँखों को साधारण से ज्यादा खोलता है ।
वीभत्स रस(vibhatsa ras) -घृणा और ग्लानि से परिपुष्ट होकर वीभत्स रस बनता है ।इसे दर्शाने के लिए नर्तक अपने चेहरे पर घृणा भाव लता है और नाक,भौं ,मस्तिष्क पर सिकुड़न लता है ।
रौद्र रस(raudra ras) -इस रस का स्थायी भाव क्रोध है ।रौद्र रस में मुँह लाल हो उठता है और आँखें जलने लगती है,दांतों के नीचे होठ एवं माथे पर वक्र रेखाएं नज़र आती है ।
भयानक रस(bhayanak ras) -इस रस का स्थायी भाव भय है ।जब नर्तक इसे दर्शाता है तो उसके चेहरे पर भये ,आँखें खुली हुई ,भौएं ऊपर की ओर,शरीर स्थिर एवं मुँह खुला हुआ रहता है ।
शांत रस(shant ras) -जब मानव सांसारिक सुख दुःख ,चिंता आदि मनोविकारों से मुक्ति प् जाता है तो उसमे शांत रस की उत्पत्ति होती है ।इस रस का स्थायी भाव शाम या निर्वेद है ।इसे दर्शाने के लिए चहरे पर स्थिरता ,आँख की दृष्टि नीचे की ओर ,और नाक, भौं एवं मस्तिष्क अपने स्वाभाविक स्थान पर होता है ।
अतएव हम देखते हैं की रस के अनुसार मनुष्य का बाहरी भाव बदलता रहता है ।

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